आईसीएआर पटना की पांच टीमें, एक लक्ष्य: खेत तक पहुंचेगा कृषि अनुसंधान
- by Manjesh Kumar
- 10-Aug-2026
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पटना: राजधानी पटना के भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद–पूर्वी अनुसंधान परिसर में आयोजित तीन दिवसीय संस्थान अनुसंधान परिषद बैठक–2026 का शुक्रवार को समापन हुआ। बैठक में पूर्वी भारत के किसानों के लिए जलवायु-सहिष्णु, टिकाऊ और लाभकारी कृषि के समाधान विकसित करने पर विशेष जोर दिया गया। 5 से 7 अगस्त तक आयोजित इस बैठक में संस्थान की चल रही अनुसंधान परियोजनाओं की समीक्षा की गई तथा किसानों की बदलती जरूरतों और राष्ट्रीय कृषि प्राथमिकताओं के अनुरूप नई अनुसंधान पहलों पर विचार-विमर्श किया गया। बैठक में पांच प्रमुख विषयगत कार्यक्रमों के अंतर्गत संचालित 85 अनुसंधान उप-परियोजनाओं की विस्तृत समीक्षा की गई।
संस्थान के निदेशक एवं संस्थान अनुसंधान परिषद के अध्यक्ष डॉ अनुप दास ने वैज्ञानिकों से “एक टीम, एक कार्य” की भावना से काम करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि अनुसंधान का उद्देश्य ऐसी तकनीक और समाधान विकसित करना होना चाहिए, जो किसानों की वास्तविक समस्याओं को दूर करें, संसाधनों का बेहतर उपयोग करें तथा खेती की उत्पादकता और किसानों की आय बढ़ाने में मदद करें। उन्होंने वैज्ञानिकों से स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित कर अनुसंधान को तेजी से खेत तक पहुँचाने पर जोर दिया। उन्होंने यह भी कहा कि अनुसंधान के दौरान आने वाली चुनौतियाँ और बाधाएँ अक्सर बेहतर एवं प्रभावशाली परिणामों का आधार बनती हैं।
फसल अनुसंधान प्रभाग के प्रमुख डॉ संजीव कुमार ने “जलवायु-सहिष्णु कृषि के लिए पुनर्योजी एवं समेकित कृषि प्रणालियां” विषय का नेतृत्व किया। इसके अंतर्गत संरक्षण कृषि के माध्यम से धान परती क्षेत्र का बेहतर उपयोग, धान–गेहूं प्रणाली का सतत गहनीकरण, प्राकृतिक खेती, लघु एवं सीमांत किसानों के लिए समेकित कृषि प्रणाली मॉडल, फसल विविधीकरण, विभिन्न तनावों को सहन करने वाली फसल किस्मों का विकास, कृषिवानिकी, पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं तथा पादप संरक्षण पर चर्चा की गई। डॉ कुमार ने ऐसी कृषि प्रणालियां विकसित करने पर जोर दिया, जो बदलती जलवायु के बीच भी अच्छी उपज और लाभ दें तथा संसाधनों के कुशल उपयोग के साथ किसानों की आय बढ़ाने में मदद करें।
कृषि प्रणाली का पहाड़ी एवं पठारी अनुसंधान केंद्र, रांची के प्रमुख डॉ अवनि कुमार सिंह ने “बागवानी फसलों के आनुवंशिक संसाधन प्रबंधन एवं उन्नत उत्पादन प्रौद्योगिकियाँ” विषय का नेतृत्व किया। इसके अंतर्गत आनुवंशिक संसाधनों का प्रबंधन, किस्म सुधार, उन्नत उत्पादन प्रौद्योगिकियाँ, संरक्षित खेती, कटाई उपरांत प्रबंधन तथा मूल्य संवर्धन पर विचार-विमर्श किया गया। डॉ. सिंह ने कहा कि फलों एवं सब्जियों की बेहतर किस्मों और उत्पादन तकनीकों को किसानों की जरूरतों तथा बाजार की संभावनाओं से जोड़ना जरूरी है, ताकि बागवानी किसानों को बेहतर उत्पादन, गुणवत्ता और आय का लाभ मिल सके।
भूमि एवं जल प्रबंधन प्रभाग के प्रमुख डॉ आशुतोष उपाध्याय ने “भूमि एवं जल उत्पादकता बढ़ाने के लिए प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन” विषय का नेतृत्व किया। इसके अंतर्गत मृदा, भूमि एवं जल संसाधनों के कुशल प्रबंधन, जल उत्पादकता एवं पोषक तत्व उपयोग दक्षता बढ़ाने, परिशुद्ध जल एवं पोषक तत्व प्रबंधन तथा नवीकरणीय ऊर्जा के उपयोग पर चर्चा की गई। डॉ उपाध्याय ने सौर ऊर्जा, सेंसर-आधारित सिंचाई, धान परती क्षेत्र के मानचित्र तथा प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर उपयोग से जुड़ी तकनीकों पर अनुसंधान को बढ़ावा देने का आह्वान किया, ताकि किसानों को कम पानी और संसाधनों में बेहतर उत्पादन मिल सके। पशुधन एवं मत्स्य प्रबंधन प्रभाग के प्रमुख डॉ. कमल शर्मा ने “सतत पशुधन एवं मत्स्य उत्पादन प्रणालियाँ” विषय का नेतृत्व किया। इसके अंतर्गत पशुधन एवं मत्स्य उत्पादन में सुधार, सतत उत्पादन प्रणालियाँ, फसल–पशुधन–मत्स्य एकीकरण, आनुवंशिक संसाधनों का संरक्षण, पशु स्वास्थ्य, रोग निगरानी, संसाधनों का पुनर्चक्रण तथा आजीविका संवर्धन पर चर्चा हुई। डॉ. शर्मा ने कहा कि फसल के साथ पशुपालन और मत्स्य पालन को जोड़ने से किसानों की आय के अतिरिक्त स्रोत विकसित किए जा सकते हैं तथा छोटे और सीमांत किसानों की जलवायु एवं अन्य जोखिमों से निपटने की क्षमता बढ़ाई जा सकती है।
सामाजिक-आर्थिक एवं प्रसार प्रभाग के प्रमुख डॉ उज्ज्वल कुमार ने “सामाजिक-आर्थिक, प्रसार एवं नीति अनुसंधान” विषय का नेतृत्व किया। इसके अंतर्गत कृषि विकास के सामाजिक-आर्थिक पहलुओं, प्रौद्योगिकी अपनाने, कार्बन क्रेडिट, पूर्वानुमान के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता एवं मशीन लर्निंग के अनुप्रयोग, प्रौद्योगिकी प्रसार तथा नीतिगत सहयोग पर चर्चा की गई। डॉ. कुमार ने कहा कि कृषि तकनीकों की सफलता का आकलन केवल वैज्ञानिक परिणामों के आधार पर नहीं, बल्कि किसानों की आय, आजीविका तथा सामाजिक और पर्यावरणीय लाभों के आधार पर भी किया जाना चाहिए। बैठक में प्रयोगशाला एवं प्रायोगिक स्तर पर सफल उन्नत किस्मों और तकनीकों को व्यापक क्षेत्र में किसानों तक पहुँचाने पर विशेष जोर दिया गया। वैज्ञानिकों ने कहा कि भविष्य का कृषि अनुसंधान समेकित, मांग-आधारित, जलवायु-सहिष्णु और प्रभाव-केंद्रित होना चाहिए। नई तकनीकें वैज्ञानिक रूप से प्रभावी होने के साथ-साथ किसानों के लिए सरल, उपयोगी, बड़े स्तर पर अपनाने योग्य और आर्थिक रूप से व्यवहार्य भी होनी चाहिए। बैठक के उद्घाटन सत्र के दौरान डेवलपमेंट फोकस, बेंगलुरु के साथ कृषि प्रणाली का पहाड़ी एवं पठारी अनुसंधान केंद्र, रांची में विकसित उन्नत किस्मों के सब्जी बीज उत्पादन के लिए एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए। वहीं, समापन सत्र के दौरान कृषि विज्ञान केंद्र, रामगढ़ द्वारा जनजातीय उप-योजना के अंतर्गत गोद लिए गए उदलू गाँव की सफलता की कहानी पर आधारित एक वृत्तचित्र का विमोचन किया गया।
बैठक का समापन बहुविषयक अनुसंधान को और मजबूत करने तथा प्रयोगशाला से खेत तक प्रभावी और उपयोगी तकनीकों को तेजी से पहुँचाने की प्रतिबद्धता के साथ हुआ। इसमें किसानों की जरूरतों को अनुसंधान के केंद्र में रखने पर विशेष जोर दिया गया। सदस्य सचिव डॉ. पी.सी. चंद्रन ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया।


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