असिस्टिव टेक्नोलॉजी के लिए सशक्त नीति की अपरिहार्यता, भारत को हब बनाने की दिशा में हो काम
- by Manjesh Kumar
- 18-Jul-2026
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यदि मैं कहूं कि भारत का अगला यूनिकॉर्न कोई एआई या फिनटेक कंपनी नहीं, बल्कि ऐसी कंपनी हो सकती है, जो दिव्यांगों और बुजुर्गों के जीवन को आसान बनाने वाले उपकरणों को बनाती हो - तो क्या आप यकीन करेंगे? शायद यह बात आपको हैरान करने वाली लगे, लेकिन सच्चाई यही है कि आज व्हीलचेयर, वॉकिंग स्टिक, हियरिंग एड सहित कई अन्य सहायक उपकरणों का बाजार एक लंबी छलांग के लिए तैयार है। मैं खुद व्हीलचेयर के सहारे अपनी जिंदगी जीता हूं, इसलिए जानता हूं कि ऐसे उपकरण कितने जरूरी होते हैं। मेरे लिए सहायक उपकरण केवल एक उत्पाद नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता, सम्मान और बेहतर जीवन के सशक्त माध्यम हैं। इसलिए मैं मानता हूं कि समावेशिता की दिशा में उठाया गया एक कदम न केवल लाखों लोगों के जीवन को बदल सकता है, बल्कि देश में कई नये आर्थिक अवसरों का भी सृजन कर सकता है। आइए समझते हैं, आखिर कैसे।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, आज पूरी दुनिया में 250 करोड़ से भी अधिक लोगों को असिस्टिव टेक्नोलॉजी की जरूरत है। अनुमान है कि केवल भारत में ही यह संख्या 5 से 7 करोड़ के बीच होगी। डब्ल्यूएचओ की ग्लोबल रिपोर्ट ऑन असिस्टिव टेक्नोलॉजी बताती है कि आज दुनिया में हर तीन में से एक व्यक्ति को एक स्वतंत्र जीवन के लिए सहायक उपकरणों की जरूरत होती है और 2050 तक इस आंकड़े को 350 करोड़ तक पहुंचने की उम्मीद है। इसके बावजूद, आज केवल 5-15 प्रतिशत जरूरतमंदों तक ही ऐसी तकनीक पहुंंच पाती है। इसकी बड़ी वजह है - अधिक कीमत, सीमित उपलब्धता, जागरूकता और प्रशिक्षित विशेषज्ञों में कमी। आज दुनिया के 60 से अधिक देशों में असिस्टिव टेक्नोलॉजी को लेकर नीतियां हैं, लेकिन भारत में अब तक ऐसी कोई व्यापक राष्ट्रीय नीति नहीं है। आज भारत में इलेक्ट्रिक वाहन, सेमीकंडक्टर और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे अनेक क्षेत्रों में प्रगतिशील नीतियां मौजूद हैं, जिससे एक नये बाजार का निर्माण हुआ, निवेश को बढ़ावा मिला, रोजगार सृजन हुआ और कई यूनिकॉर्न कंपनियों का जन्म हुआ। लेकिन विश्व में सर्वाधिक दिव्यांग आबादी वाले देशों में शामिल होने और तेजी से बढ़ती बुजुर्ग आबादी के बाद भी आज भारत में असिस्टिव टेक्नोलॉजी को लेकर कोई राष्ट्रीय नीति नहीं बन पाई।
कहने की जरूरत नहीं है कि आज दुनिया में असिस्टिव टेक्नोलॉजी को कल्याणकारी योजना से परे, एक महत्वपूर्ण नीतिगत प्राथमिकता के तौर पर देखा जा रहा है। ऐसे में भारत के पास भी अवसर है कि हम अपनी आबादी, आवश्यकताओं और ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी को मद्देनजर रखते हुए एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण करें, जो लाखों लोगों को अपने जीवन में आत्मनिर्भर बनाने के साथ ही समाज में नवाचार, उद्यमिता और रोजगार के नये अवसरों का भी सृजन करे। अनुमान है कि भारत में वर्ष 2030 तक असिस्टिव टेक्नोलॉजी का बाजार 8-10 अरब डॉलर (लगभग 75,000-95,000 करोड़ रुपये) तक पहुंच सकता है। यही कारण है कि भारत को खुद को असिस्टिव टेक्नोलॉजी के ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में स्थापित करने की दिशा में गंभीर प्रयास करने चाहिए। इसके लिए हमारे पास आधारभूत ढांचा भी उपलब्ध है। आज एसटीपीआई और आईआईआईटी इलाहाबाद जैसे संस्थान असिस्टिव टेक्नोलॉजी की दिशा में काम कर रहे हैं। यदि इन्हें स्पष्ट और दूरदर्शी नीतिगत समर्थन मिले, तो असिस्टिव टेक्नोलॉजी भारत के विनिर्माण क्षेत्र की अगली बड़ी सफलता बन सकती है।
आज केन्द्र सरकार द्वारा उद्योग आधारित नवाचार को बढ़ावा देने के लिए बनाया गया ₹1 लाख करोड़ का अनुसंधान एवं विकास कोष भी इस सेक्टर के लिए बड़ा उपयोगी साबित हो सकता है। आज देश में अनेक स्टार्टअप्स एआई कम्यूनिकेशन डिवाइस, स्मार्ट मोबिलिटी डिवाइस और सस्ते प्रोस्थेटिक (कृत्रिम अंग) बना रहे हैं, लेकिन इनमें कई शुरुआती चरण से आगे नहीं बढ़ पाते हैं। इसके पीछे कई कारण हैं, जैसे - उन्हें पर्याप्त फंडिंग न मिलना, गुणवत्ता और मानकों का मजबूत ढांचा विकसित न हो पाना और निवेशकों को नीतियों के स्तर पर ज्यादा समर्थन न मिलना। कई दशकों तक भारत में असिस्टिव टेक्नोलॉजी को मुख्यतः कल्याणकारी योजना के रूप में देखा गया, जहां ध्यान केवल उपकरणों को बांटने पर रहा। दिव्यांगों को सहायक उपकरण उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शुरू एडीआईपी योजना (विकलांग व्यक्तियों को सहायता/उपकरणों की खरीद/फिटिंग के लिए सहायता योजना) जैसे प्रयास ने लाखों दिव्यांगों तक आवश्यक उपकरण पहुंचाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया और इसके लिए उनकी सराहना होनी चाहिए। हालांकि, इसका फोकस केवल एक बार उपकरण उपलब्ध कराने तक ही सीमित रहा। वास्तव में, किसी जरूरतमंद को केवल एक बार मदद मिल जाना महज एक शुरुआत है। यदि समय-समय पर सही मूल्यांकन, फिटिंग, रखरखाव और मरम्मत की व्यवस्था न हो, तो सबसे आधुनिक उपकरण भी कुछ समय बाद उपयोगी नहीं रह जाते हैं। इसलिए असिस्टिव टेक्नोलॉजी की असली सफलता केवल वितरण करने में नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने में है कि लोग उनका लंबे समय तक प्रभावी और सम्मानजनक तरीके से उपयोग कर सकें।
यही कारण है कि हमें असिस्टिव टेक्नोलॉजी को केवल एक कल्याणकारी उत्पाद नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक बुनियादी ढांचे के रूप में देखना होगा। विश्व बैंक और यूएनडीपी के अनुसार, निम्न और मध्यम आय वाले देशों को जीडीपी में 3-7 प्रतिशत नुकसान केवल इसलिए उठाना पड़ता है कि वे दिव्यांगों की शिक्षा, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा पर ज्यादा ध्यान नहीं देते हैं।
कंज्यूमर से प्रोड्यूसर बनने की दिशा में
आज हमें असिस्टिव टेक्नोलॉजी के लिए समग्र राष्ट्रीय नीति की अपरिहार्यता है, जहां सामाजिक न्याय, स्वास्थ्य, शिक्षा, कौशल विकास, उद्योग और डिजिटल तकनीक जैसे विषयों से संबंधित सभी मंत्रालय एक साझे ढांचे में जुड़े हों। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि यह नीति केवल एक बार उपकरण वितरित करने तक सीमित न रहे, अपितु लाइफसाइकिल आधारित सर्विस मॉडल को अपनाए। इसमें गुणवत्ता के स्पष्ट मानक तक किए जाएं, ताकि सुरक्षा सुनिश्चित हो। साथ ही, हमें घरेलू विनिर्माण, पुनर्वास से जुड़े विशेषज्ञों और कार्यबल, वित्तपोषण और बीमा की भी एक मजबूत व्यवस्था बनानी होगी, ताकि हर जरूरतमंद तक इन उपकरणों की उपलब्धता सुनिश्चित हो। बीते एक दशक में भारत ने यह साबित किया है कि सही नीतियां न केवल उद्यमिता को बढ़ावा देती हैं, बल्कि निजी निवेश को आकर्षित करने के साथ ही, वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी उद्योगों का निर्माण भी करती है। यदि असिस्टिव टेक्नोलॉजी के लिए भी ऐसा ही मजबूत नीतिगत ढांचा तैयार हो, तो भारत घरेलू विनिर्माण से लेकर नवाचार और रोजगार सृजन तक में एक कदम और आगे बढ़ते हुए, सस्ती और उच्च गुणवत्ता वाली अस्टिटिव टेक्नोलॉजी का ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट हब बन सकता है। आगामी जनगणना में हमारे पास देश के दिव्यांगजनों और उनकी विशेष आवश्यकताओं को बेहतर तरीके से समझने का अवसर होगा। हम जानते हैं कि वर्ष 2047 तक विकसित भारत का सपना तभी साकार हो सकता है, जब देश के हर नागरिक को अपनी क्षमता के अनुरूप राष्ट्र निर्माण में योगदान का समान अवसर मिले। इसलिए अगर भारत को सच में एक समावेशी और विकसित देश बनना है, तो असिस्टिव टेक्नोलॉजी को सार्वजनिक नीतियों के केन्द्र में लाना ही होगा।
भारत के लिए अगला दशक निर्णायक होने वाला है। यह तय करेगा कि हम असिस्टिव टेक्नोलॉजी में दूसरे देशों पर निर्भर रहेंगे या फिर अपनी डिजाइन कैपेसिटी, मैन्युफैक्चरिंग पावर और इनोवेशन के दम पर सस्ते और जरूरत आधारित समाधानों का ग्लोबल हब बनेंगे। मैं अंत में यही कहना चाहूंगा कि असिस्टिव टेक्नोलॉजी के लिए सशक्त नीति की जरूरत केवल समावेशिता सुनिश्चित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि सही मायनों में यह भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता, उत्पादकता और आर्थिक विकास के अगले अध्याय से भी जुड़ी हुई है।
लेखक अरमान अली नेशनल सेंटर फॉर प्रमोशन ऑफ एम्प्लॉयमेंट फॉर डिसेबल्ड पीपल के कार्यकारी निदेशक हैं।


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